Thursday, June 8, 2017

मेरी अपाहिज गायें...


दफ्तर के रास्तेवाले चौराहे के सिग्नलपर दिनभर भिखारीयोंका जमघट लगा रहता है। 
अधनंगे यतीम बच्चे, बेवा औरते और बेसहारा बुढे, हाथ फैलाते हुये आंखोंमें उम्मीदोंका समंदर समाये खडे रहते है। 
उनके धुंधलेसे चेहरे पर जमाने की धुत्कार साफ दिखती है, सुरज की तपीश और बारीश की मार उनकी झुर्रीयोंमें नजर आती है। 
हाथोंपे उनकी भी लकीरे होती हैं पर उन्हे कोई भविष्य होता नही । 
उनके फटे होंठ भूक की जुबां बोलते है और
जमाना होता है की कानोंमे जूं तक रेंगने नही देता !
अक्सर यही तस्बीर देखकर सबकी आंखे पथरीली हो गई हैं,
मैं भी इसी भीड का अधमरा हिस्सा बनकर इन्हे देखकर आदतन आहे भरता हुं। 
दिनभर में कई सौ रुपिये खर्चे करता हुं,
सोशल मिडिया पे एक्टीव्ह रहता हुं।
लंबी चौडी बाते करता हुं,
न जाने कई सारे डिंगे हाकता हुं।
रेस्तरॉ जाता हूं, फुरसत से थियेटरभी जाता हूं, म्युझिक सुनता हुं, मोबाईल का लुफ्त उठाता हूं।
इंटर कॉंटीनेंटल फूड के मायने गुगल पर तलाशता हुं,
ब्रोकोली के स्वादिष्ट व्यंजन ढुंढता हुं। 
काम खत्म करके दोस्तोंके साथ चहल कदमी करता हुं,
पार्क पे जाता हुं। 
देर रात घर जाते वक्त
उसी भीड भाडवाले चौराहे के सिग्नलपर तेज तर्रार बाईक दौडाता हुं।
तो आन्खोंके कोने से न चाहते हुये भी देखता हुं। 
फुटपाथ को मखमल का बिस्तर समझे हुये
मुरझा हुआ बचपन खालीपेट सोया पाता हुं ।
फिरसे खोकली आहें भरते हुये घर जाके
पेटभर खाने के बाद सस्ती निंद का मजा लेता हुं। 

ऐसेही रोजाना लोगोंमे जब बहस छीडती है,
तो मै भूख प्यास और भुखमरी पे खूब बोलता हुं। 
गर्व से बयां करता हुं के,
मैं आजकल गाय का बहोत खयाल रखता हुं, उन्हे मरने नही देता।  
लोग भी सुनकर खुश हो जाते है, मेरी सराहना करते हैं।   

सिग्नलपे खडी भूखी प्यासी बिरादरी के लिये
मै अक्सर सिसकीयां छोडता रहता हुं। 
गायोंकी अपाहिज भूत दया को हृदय में बडे नाज सें संजोये हुये
उनको अनदेखा करते वहां सें आता जाता हुं ।

किसी रात सपने में किसी रईसजादे को सिग्नलपे सोये हुये भिखारीयोंको कुचलता हुआ देखकर पसीनेसे लतपत होकर जाग जाता हुं ।
कोई एक मरता हुआ भिखारी बच्चा,
उसके गंदे खूनसे रंगे हुये हाथसे सुखी रोटी का टुकडा मुझे मवेशी समझके खिलाते हुये पाता हुं ....

अक्सर मेरी अपाहिज भूतदया को मै नाझ से संजोता हुं....            


- समीर.