Wednesday, October 26, 2016

इस दिवाली ....

इस दिवाली कुछ दिये उनके घर में जलाते है, जिनके इफ्लाज दिलोजिस्म ताउम्र जलते है
कुछ रोशनी उनके हिस्से की उन्हेही बाँटते है, जिनके आँगन में अंधेरोंकी बस्ती होती है ....

इस दिवाली कुछ दिये उनके घर में जलाते है, जिनके आंखोंमें उजालोंके सपने रेंगते है....
कुछ रंगीली खुशियां उनके झोली में भर देते है, जिनके चेहरे पर मुद्दत से उदासी छायी है.....

इस दिवाली कुछ दिये उनके घर में जलाते है, जिनके सुखे होठोंसे भूख की दास्ता रोती है
कुछ लुभावनी मिठास उनके निवाले में डाल देते हैं, जिन्हे मुश्कील से खाना नसीब होता है....
इस दिवाली कुछ दिये उनके घर में जलाते है, जिनके अंधेरे साये उन्हीपे हावी होंते है
कुछ पटाखे उन नन्हे हाथोंमें थमा देते हैं, जिनकी रेखाओंको उफ्ताबने ध्वस्त कर दिया है...

इस दिवाली कुछ दिये उनके घर में जलाते है, जिनके आँगन में रंगोलीयोंके रंग नही होते है
कुछ सुहाने तोह्फे उनके घर भी दे आते हैं, जिन्हे अपने आशियाने भी नसीब नही होते है ....

इस दिवाली कुछ दिये उनके घर में जलाते है, जिनके दिल में मुरादोंके साये भी नही होते है
कुछ बंजर सपने उनके पुरे कर देते हैं, जिनके खुश्क दिल के गुलशन मुर्झाये होते हैं....

इस दिवाली कुछ दिये उनके घर में जलाते है, जिनके जेरे आफताब अधेरोंसे घिरे रहते है
इस दिवाली को और भी रोशन कर देते हैं, अपने हिस्से का कुछ खुशनुमा आसमां उन्हे बाँट देते हैं ......

हमवतनोंके दरमियांके कुछ फासले कम करते हैं, उम्मीदोंके कुछ सेहरे उनके सिरपें बांधते है
कुछ नजर अंदाज हुये उनके दुखदर्द सुन लेते हैं, इस दिवाली खुशियोंकी की सही सौगात देते है...

दुसरोंकी खुशियोंका सही लुत्फ उठाते है, इस दिवाली जिंदगी के कुछ मायने सिख लेते हैं
इस दिवाली कुछ दिये अपने दिल में भी जगाते है, जो इफ्लासी खुदगर्जी के अंधेरोसे बुझे पडे है.....

- समीर..